दिल्ली

निवेश बढ़ा, भरोसा घटा—दिल्ली की बसों से क्यों दूर हो रहे लाखों यात्री?

दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती बसें कभी आम आदमी की जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा हुआ करती थीं। दफ्तर जाने से लेकर स्कूल, बाजार और अस्पताल तक, हर जरूरत के लिए बसें ही सबसे सुलभ और किफायती साधन मानी जाती थीं। लेकिन आज तस्वीर बदलती नजर आ रही है। बसों की संख्या में इजाफा हुआ है, सरकार का खर्च कई गुना बढ़ा है, तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ा है—फिर भी यात्रियों की संख्या घट रही है। कोविड-19 महामारी के बाद यह गिरावट और साफ दिखाई देने लगी है, जहां रोजाना करीब 10 लाख यात्री बसों से दूर हो गए हैं।

दिल्ली परिवहन निगम और क्लस्टर बसों का नेटवर्क लंबे समय तक राजधानी की लाइफलाइन रहा है। महामारी से पहले रोजाना 40 से 45 लाख लोग बसों का उपयोग करते थे। लेकिन अब यह आंकड़ा घटकर 30 से 35 लाख के बीच सिमट गया है। यह केवल आंकड़ों की गिरावट नहीं, बल्कि एक बड़ी चेतावनी है कि कहीं न कहीं व्यवस्था लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही।

दिल्ली सरकार ने परिवहन क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए आर्थिक सर्वे 2025-26 में लगभग 11,964 करोड़ रुपये का बजट तय किया है। इसके अलावा बस सेवाओं के घाटे को पूरा करने के लिए भी भारी सब्सिडी दी जा रही है। इतना बड़ा निवेश होने के बावजूद यात्रियों की संख्या में गिरावट यह संकेत देती है कि समस्या सिर्फ संसाधनों की नहीं, बल्कि उनकी उपयोगिता और प्रबंधन की है।

जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो कई समस्याएं साफ नजर आती हैं। सबसे बड़ी परेशानी है बसों की अनिश्चित टाइमिंग। कई बार बसें समय पर नहीं आतीं, जिससे यात्रियों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। रोजाना काम पर जाने वाले लोगों के लिए यह देरी असुविधाजनक होती है, जिसके कारण वे दूसरे विकल्प तलाशने लगते हैं।

इसके अलावा कई रूट्स पर बसों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। जहां जरूरत ज्यादा है, वहां बसें कम हैं और जहां जरूरत कम है, वहां बसें ज्यादा चल रही हैं। इस असंतुलन के कारण यात्रियों का अनुभव खराब होता है और वे धीरे-धीरे बसों से दूरी बनाने लगते हैं।

लास्ट माइल कनेक्टिविटी की समस्या भी कम नहीं है। बस स्टॉप तक पहुंचना या वहां से अंतिम गंतव्य तक जाना कई बार मुश्किल हो जाता है। ऐसे में लोग मेट्रो, ऑटो या कैब को ज्यादा सुविधाजनक मानते हैं। खासकर नई पीढ़ी तेज और आरामदायक सफर को प्राथमिकता देती है, जिसमें बस सेवा कई बार पीछे रह जाती है।

हालांकि, यह भी सच है कि दिल्ली में बसों का बेड़ा पहले से बड़ा हुआ है। 2018-19 में जहां कुल बसों की संख्या 6,000 के आसपास थी, वहीं अब यह बढ़कर 7,500 के करीब पहुंच चुकी है। इसमें इलेक्ट्रिक बसों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो पर्यावरण के लिहाज से एक सकारात्मक कदम है।

राजधानी आज देश में सबसे ज्यादा ई-बसों वाले शहरों में शामिल हो चुकी है। 4,300 से अधिक इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर चल रही हैं, जो प्रदूषण कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने का काम कर रही हैं। लेकिन इन सबके बावजूद यात्रियों की संख्या में गिरावट यह दिखाती है कि केवल तकनीकी सुधार ही पर्याप्त नहीं हैं।

कोविड-19 के बाद लोगों की जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है। वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ने से रोजाना यात्रा करने वालों की संख्या कम हो गई है। इसके अलावा स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी सतर्कता के कारण लोग भीड़भाड़ से बचना चाहते हैं।

निजी वाहनों की बढ़ती संख्या भी इस गिरावट का एक बड़ा कारण है। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ रही है, वे दोपहिया और चारपहिया वाहन खरीद रहे हैं। इससे सार्वजनिक परिवहन पर निर्भरता कम हो रही है और सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ रहा है।

दिल्ली मेट्रो का विस्तार भी एक अहम फैक्टर है। मेट्रो की तेज, सुरक्षित और समयबद्ध सेवा के कारण लोग बसों की बजाय मेट्रो को प्राथमिकता दे रहे हैं। खासकर लंबी दूरी के यात्रियों के लिए मेट्रो अधिक सुविधाजनक विकल्प बन चुकी है।

इस स्थिति से निपटने के लिए जरूरी है कि बस सेवा को अधिक भरोसेमंद और आकर्षक बनाया जाए। बसों की फ्रीक्वेंसी बढ़ानी होगी, टाइमिंग को सटीक करना होगा और रूट्स को यात्रियों की जरूरत के अनुसार पुनर्गठित करना होगा।

डिजिटल टेक्नोलॉजी का बेहतर उपयोग भी जरूरी है। यदि यात्रियों को मोबाइल ऐप के जरिए बसों की सही जानकारी मिले, तो उनका भरोसा बढ़ सकता है। इसके अलावा बस स्टॉप्स की स्थिति सुधारनी होगी, ताकि वे सुरक्षित और सुविधाजनक बन सकें।

सरकार को यह भी समझना होगा कि सार्वजनिक परिवहन केवल एक सेवा नहीं, बल्कि शहर की जीवनरेखा है। यदि लोग इससे दूर होते गए, तो ट्रैफिक, प्रदूषण और ऊर्जा संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी।

अंत में कहा जा सकता है कि दिल्ली की बस सेवा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सुधार की बहुत जरूरत है। संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन सही रणनीति और बेहतर क्रियान्वयन की आवश्यकता है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गहरी हो सकती है। वहीं, यदि योजनाओं को सही दिशा में लागू किया जाए, तो बसें एक बार फिर से दिल्लीवासियों की पहली पसंद बन सकती हैं।

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