दिल्ली

बढ़ती डिग्रियां, घटते मौके—देश में स्नातक बेरोजगारी बनी बड़ी चुनौती

भारत में शिक्षा का स्तर पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ा है। पहले जहां उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित थी, वहीं अब लाखों युवा कॉलेज और विश्वविद्यालयों से डिग्री हासिल कर रहे हैं। लेकिन इस बढ़ती शिक्षा के साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है—स्नातक बेरोजगारी। हाल ही में जारी एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस संकट की गंभीरता को उजागर किया है, जिसमें बताया गया है कि देश में करीब 1.1 करोड़ स्नातक बेरोजगार हैं और लगभग 40 प्रतिशत युवा नौकरी पाने में असफल हो रहे हैं।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि शिक्षा को हमेशा बेहतर भविष्य और स्थिर करियर का माध्यम माना जाता रहा है। लेकिन अब यह धारणा धीरे-धीरे कमजोर पड़ती नजर आ रही है। लाखों युवा डिग्री हासिल करने के बावजूद नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे उनके सामने आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, देश में 20 से 29 वर्ष के बीच लगभग 6.3 करोड़ स्नातक हैं। यह संख्या अपने आप में भारत के शैक्षिक विस्तार को दर्शाती है। लेकिन इनमें से 1.1 करोड़ युवाओं का बेरोजगार होना यह बताता है कि रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ पाए हैं। इससे यह साफ होता है कि शिक्षा और रोजगार के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है।

सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक तथ्य यह है कि जो युवा नौकरी के लिए पंजीकरण कराते हैं, उनमें से केवल 7 प्रतिशत को ही एक साल के भीतर स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। यानी बाकी के 93 प्रतिशत युवाओं को या तो लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है या फिर उन्हें अस्थायी और कम वेतन वाले कामों से संतोष करना पड़ता है। यह स्थिति उनके करियर की शुरुआत को ही कमजोर बना देती है।

युवाओं में बेरोजगारी की दर उम्र के हिसाब से भी अलग-अलग है। 15 से 25 वर्ष के स्नातकों में बेरोजगारी दर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो बेहद गंभीर स्थिति को दर्शाती है। वहीं 25 से 29 वर्ष के युवाओं में यह दर करीब 20 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, कुछ युवाओं को रोजगार मिल जाता है, लेकिन शुरुआती दौर में उन्हें भारी संघर्ष करना पड़ता है।

हालांकि, जो युवा नौकरी पाने में सफल होते हैं, उनकी स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होती है। रिपोर्ट बताती है कि स्नातक युवाओं की शुरुआती आय गैर-स्नातकों की तुलना में लगभग दोगुनी होती है। यह दर्शाता है कि शिक्षा का महत्व अभी भी बना हुआ है, लेकिन समस्या यह है कि हर किसी को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू वेतन वृद्धि से जुड़ा है। 2011 के बाद युवा पुरुष स्नातकों के वेतन में वृद्धि की गति धीमी हो गई है। इसका मतलब यह है कि नौकरी मिलने के बाद भी आय में तेजी से बढ़ोतरी नहीं हो रही, जिससे जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है। इससे युवाओं में असंतोष और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।

उच्च शिक्षा में नामांकन दर में भी बड़ा बदलाव आया है। पिछले चार दशकों में यह दर बढ़कर लगभग 28 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसमें महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है, जो एक सकारात्मक सामाजिक बदलाव का संकेत है। महिलाएं अब शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और अपने करियर को लेकर अधिक जागरूक हो रही हैं।

दूसरी ओर, पुरुषों की नामांकन दर में गिरावट देखी गई है। 2017 में जहां यह 38 प्रतिशत थी, वहीं हाल के वर्षों में घटकर 34 प्रतिशत रह गई है। इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक जिम्मेदारियां हैं। कई युवा पुरुष अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए जल्दी काम की तलाश में निकल पड़ते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई अधूरी रह जाती है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गरीब परिवारों के युवाओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ी है। 2007 में जहां यह केवल 8 प्रतिशत थी, वहीं 2017 तक बढ़कर 15 प्रतिशत हो गई। यह एक सकारात्मक संकेत है कि अब शिक्षा का दायरा व्यापक हो रहा है और समाज के हर वर्ग तक पहुंच रहा है। हालांकि, आर्थिक बाधाएं अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

महंगे पेशेवर कोर्स जैसे इंजीनियरिंग और मेडिकल में आज भी अधिकतर छात्र संपन्न परिवारों से आते हैं। इसका कारण इन कोर्स की ऊंची फीस और संसाधनों की कमी है। गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए इन क्षेत्रों में प्रवेश पाना अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

देश की अर्थव्यवस्था में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां कृषि क्षेत्र में अधिक लोग काम करते थे, वहीं अब युवा सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। इन क्षेत्रों में बेहतर वेतन और करियर के अवसर मिलने की संभावना अधिक होती है। लेकिन इन क्षेत्रों में भी नौकरियों की सीमित संख्या के कारण प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई है।

कौशल विकास के क्षेत्र में भी कई प्रयास किए गए हैं। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में पिछले एक दशक में लगभग 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका उद्देश्य युवाओं को तकनीकी और व्यावसायिक कौशल प्रदान करना है, ताकि वे रोजगार के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकें।

हालांकि, निजी संस्थानों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। कई जगहों पर शिक्षा का स्तर अपेक्षित नहीं है, जिससे छात्रों को वह कौशल नहीं मिल पाता जिसकी जरूरत उद्योगों में होती है। इससे डिग्री होने के बावजूद युवाओं को नौकरी पाने में कठिनाई होती है।

यह पूरी स्थिति इस बात को स्पष्ट करती है कि केवल शिक्षा का विस्तार पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जाए और उसे रोजगार से जोड़ा जाए। छात्रों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक और तकनीकी कौशल भी सिखाया जाना चाहिए।

सरकार को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। शिक्षा और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना जरूरी है। इसके अलावा, ऐसे कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए जो युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करें और उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करें।

निजी क्षेत्र की भागीदारी भी इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण हो सकती है। कंपनियों को प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप के अवसर बढ़ाने चाहिए। इससे युवाओं को वास्तविक कार्य अनुभव मिलेगा और उनकी रोजगार क्षमता बढ़ेगी।

स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देना भी एक प्रभावी उपाय हो सकता है। इससे युवा खुद के लिए और दूसरों के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं। आज के समय में नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी हो गया है।

अंत में, यह कहा जा सकता है कि भारत में स्नातक बेरोजगारी एक जटिल और गंभीर समस्या बन चुकी है। यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक स्थिरता और विकास से भी जुड़ा हुआ है। अगर इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह आने वाले वर्षों में और भी बड़ा संकट बन सकता है।

देश के युवाओं की ऊर्जा और क्षमता को सही दिशा में उपयोग करने के लिए जरूरी है कि उन्हें पर्याप्त अवसर दिए जाएं। शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच संतुलन बनाकर ही इस समस्या का समाधान संभव है। तभी भारत का युवा आत्मनिर्भर बन सकेगा और देश को विकास के नए आयाम तक पहुंचा सकेगा।

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