
IVF से बदलेगी डेयरी की तस्वीर
समाचार क्यारी (उत्तर प्रदेश, मुजफ्फरनगर)
उत्तर प्रदेश के Muzaffarnagar जिले से पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। यहां पहली बार किसी गाय अभयारण्य में आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक के माध्यम से बछड़ों और बछियों का सफल जन्म कराया गया है। इस उपलब्धि को न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि यह देश के डेयरी सेक्टर के लिए भी एक नई दिशा तय कर सकती है।

यह प्रयोग पुरकाजी क्षेत्र के तुगलकपुर कम्हेड़ा गांव स्थित गाय अभयारण्य में किया गया, जिसे देश का पहला केंद्र-वित्त पोषित गौ अभयारण्य माना जाता है। यहां जन्मे बछड़ों और बछियों को हीरा, मोती, नंदिनी और पद्मिनी नाम दिया गया है। इनमें नंदिनी और पद्मिनी गिर नस्ल की बछिया हैं, जबकि हीरा और मोती साहिवाल नस्ल के बछड़े हैं—दोनों ही नस्लें भारत की सर्वोत्तम दुग्ध उत्पादन क्षमता के लिए जानी जाती हैं।
इस पूरे प्रोजेक्ट की खास बात यह है कि अब तक आईवीएफ या एम्ब्रियो ट्रांसफर तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से शोध संस्थानों तक ही सीमित था, लेकिन पहली बार इसे एक गौशाला या अभयारण्य स्तर पर लागू किया गया है। इससे यह साबित होता है कि आधुनिक तकनीक अब ग्रामीण और पशुपालन आधारित क्षेत्रों तक भी पहुंच रही है।
इस उपलब्धि के पीछे वैज्ञानिक प्रक्रिया काफी रोचक और महत्वपूर्ण है। सबसे पहले देश की उच्च गुणवत्ता वाली गायों के अंडाणु और बेहतरीन नस्ल के सांडों के शुक्राणु को प्रयोगशाला में मिलाकर भ्रूण (एम्ब्रियो) तैयार किया जाता है। इसके बाद इस भ्रूण को उन गायों में प्रत्यारोपित किया जाता है, जो स्वयं अच्छी नस्ल की नहीं होतीं, बल्कि बेसहारा या कम उत्पादन वाली होती हैं। इस प्रक्रिया में ये गायें एक तरह से ‘सरोगेट मदर’ की भूमिका निभाती हैं।
मुजफ्फरनगर के इस अभयारण्य में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई। यहां पर सड़क, खेतों और शहरों में घूमने वाली बेसहारा गायों को आश्रय दिया गया है। सामान्यतः ये गायें दूध उत्पादन के लिहाज से उपयोगी नहीं मानी जातीं, लेकिन इस तकनीक के जरिए इन्हें एक नई भूमिका दी गई है।
करीब तीन महीने पहले इस तकनीक के माध्यम से चार बछड़ों का जन्म हुआ था और हाल ही में दो बछियों ने भी जन्म लिया है। इस तरह कुल छह पशु इस परियोजना के तहत पैदा हो चुके हैं, जो सभी उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल से संबंधित हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन बछियों की दूध देने की क्षमता बेहद अधिक होगी। अनुमान है कि जब ये पूरी तरह विकसित हो जाएंगी, तो प्रतिदिन लगभग 20 से 21 लीटर तक दूध दे सकेंगी। यह आंकड़ा सामान्य देसी गायों की तुलना में काफी अधिक है और डेयरी उद्योग के लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकता है।
इस परियोजना को राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (NDDB) के निर्देशन में चलाया जा रहा है। प्रत्येक भ्रूण प्रत्यारोपण की लागत लगभग 25 हजार रुपये बताई गई है। योजना के तहत कुल 500 भ्रूण प्रत्यारोपण करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से अब तक 161 प्रत्यारोपण पूरे किए जा चुके हैं।
इस पहल का उद्देश्य केवल उच्च गुणवत्ता वाले पशु तैयार करना ही नहीं है, बल्कि देश में दुग्ध उत्पादन को बढ़ाना और पशुपालकों की आय में सुधार करना भी है। अगर यह प्रयोग बड़े स्तर पर सफल होता है, तो आने वाले समय में भारत का डेयरी सेक्टर और अधिक मजबूत हो सकता है।
इस परियोजना से जुड़ी एक और खास बात यह है कि इसमें भारतीय नस्लों को प्राथमिकता दी जा रही है। गिर और साहिवाल जैसी नस्लें पहले से ही अपनी उच्च दूध उत्पादन क्षमता और बेहतर अनुकूलन के लिए जानी जाती हैं। इन नस्लों को बढ़ावा देकर देश में स्वदेशी पशुधन को मजबूत किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में पशुपालन के क्षेत्र में क्रांति ला सकती है। इससे न केवल उच्च गुणवत्ता वाले पशु कम समय में तैयार किए जा सकते हैं, बल्कि कम उत्पादन वाली गायों का भी बेहतर उपयोग संभव हो पाएगा।
इसके अलावा, इस तकनीक से आवारा पशुओं की समस्या का समाधान भी निकल सकता है। जिन गायों को अब तक अनुपयोगी समझा जाता था, उन्हें अब डेयरी उत्पादन की मुख्यधारा में लाया जा सकता है।
भविष्य की योजनाओं की बात करें, तो इस अभयारण्य में आगे चलकर देश की सबसे छोटी कद वाली गाय ‘पुंगनूर’ नस्ल को भी तैयार करने की योजना है। यह नस्ल अपनी कम ऊंचाई और अच्छी उत्पादन क्षमता के लिए जानी जाती है।
इस उपलब्धि को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत में पशुपालन का भविष्य अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण की ओर जा रहा है। यह न केवल किसानों और पशुपालकों के लिए फायदेमंद है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करेगा।
अंत में, मुजफ्फरनगर का यह प्रयोग एक उदाहरण है कि अगर सही दिशा में तकनीक का उपयोग किया जाए, तो पारंपरिक क्षेत्रों में भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। आने वाले समय में यह मॉडल देश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जा सकता है, जिससे भारत विश्व के अग्रणी डेयरी उत्पादक देशों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा।




