उत्तर प्रदेश

कानपुर कचहरी में दर्दनाक अंत: दो पन्नों के सुसाइड नोट में झलका प्रियांशु का टूटता मन और बिखरता विश्वास

समाचार क्यारी (उत्तर प्रदेश, कानपुर)

कानपुर की कचहरी परिसर में घटी एक दर्दनाक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। 24 वर्षीय प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव ने पांचवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी। यह मामला केवल एक आत्महत्या की खबर भर नहीं है, बल्कि उस मानसिक संघर्ष की कहानी है, जो अक्सर लोगों के भीतर चुपचाप पनपता रहता है और एक दिन भयानक रूप ले लेता है। प्रियांशु द्वारा छोड़ा गया दो पन्नों का सुसाइड नोट इस दर्द, अपमान और दबाव की गवाही देता है, जिसे वह लंबे समय से झेल रहा था।

घटना गुरुवार दोपहर की बताई जा रही है। कचहरी परिसर में मौजूद लोगों ने अचानक देखा कि एक युवक ऊंचाई से नीचे गिर गया। तुरंत पुलिस और सुरक्षा कर्मियों को सूचना दी गई। उसे आनन-फानन अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बाद में उसकी पहचान प्रियांशु श्रीवास्तव के रूप में हुई, जो हाल ही में कानून की पढ़ाई पूरी कर अपने पिता के साथ वकालत का प्रशिक्षण ले रहा था।

प्रियांशु की मौत से पहले उसने जो सुसाइड नोट लिखा, वह बेहद मार्मिक और विचार करने पर मजबूर करने वाला है। उसने अपनी आखिरी इच्छा में लिखा कि जो भी इस नोट को पढ़े, वह इसे अंत तक जरूर पढ़े। इस नोट में उसने अपने पिता के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट, बचपन की कड़वी यादें और लगातार झेलते रहे मानसिक दबाव को विस्तार से बताया है।

सुसाइड नोट में उसने एक ऐसी घटना का जिक्र किया, जो उसके बचपन की है। उसने लिखा कि जब वह मात्र छह साल का था, तब उसने फ्रिज में रखा मैंगोशेक चुपके से पी लिया था। इस छोटी सी गलती के लिए उसके पिता ने उसे निर्वस्त्र कर घर से बाहर निकाल दिया था। यह घटना उसके मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ गई कि वह जिंदगी भर उसे भूल नहीं पाया। इस तरह की घटनाओं ने उसके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाई।

प्रियांशु ने यह भी लिखा कि पढ़ाई को लेकर उस पर हमेशा दबाव बनाया गया। हालांकि, उसे सख्ती से कोई समस्या नहीं थी, लेकिन हर समय उस पर शक करना, उसकी गतिविधियों पर नजर रखना और हर पल उसका हिसाब मांगना उसे मानसिक रूप से परेशान करता रहा। उसे ऐसा महसूस होता था कि उसकी जिंदगी पर उसका खुद का कोई नियंत्रण नहीं है।

सुसाइड नोट के अनुसार, उसके पिता अक्सर उसे लोगों के सामने अपमानित करते थे। बचपन की छोटी-छोटी गलतियों को बार-बार दोहराकर उसे शर्मिंदा किया जाता था। कक्षा नौ में विषय चयन के समय भी उसे अपनी पसंद के खिलाफ निर्णय लेना पड़ा, क्योंकि उसे पिता के गुस्से और अपमान का डर था।

उसने लिखा कि हाईस्कूल में कम अंक आने के बाद वह घर छोड़कर मथुरा चला गया था। यह कदम उसके अंदर के तनाव और दबाव का नतीजा था। इसके बावजूद, उसने अपने परिवार के लिए जिम्मेदारियों को निभाने की पूरी कोशिश की। उसने ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च में मदद की और ऑनलाइन काम करके पिता के लिए मोबाइल और बहन के लिए फोन और स्कूटी तक खरीदी।

लेकिन इन सब प्रयासों के बावजूद उसे कभी सराहना नहीं मिली। उल्टा उसे कमजोर और नाकाबिल बताया गया। उसने लिखा कि उसके जीवन में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया जाता था—कौन फोन कर रहा है, कहां जा रहे हो, किससे मिल रहे हो—हर बात पर सवाल उठाए जाते थे। इससे वह मानसिक रूप से टूटता चला गया।

घटना वाले दिन भी, उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उसके पिता ने मोहल्ले में सबके सामने उसे अपमानित किया। यह घटना उसके लिए अंतिम झटका साबित हुई। उसने लिखा कि वह अब इस तरह की जिंदगी नहीं जी सकता और इसलिए उसने यह कदम उठाने का फैसला किया।

अपने नोट में उसने एक बेहद भावुक और कड़वी पंक्ति लिखी—“पापा जीत गए, उन्हें जीत मुबारक हो।” यह वाक्य उसके भीतर के दर्द और हार की भावना को दर्शाता है। उसने यह भी लिखा कि वह नहीं चाहता कि उसके पिता उसके शव को छुएं। यह दर्शाता है कि उसके मन में कितनी गहरी पीड़ा और आक्रोश था।

हालांकि, उसने अपने सुसाइड नोट में यह भी लिखा कि उसके पिता के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए। साथ ही, उसने अपनी मां और बहन के लिए प्यार और चिंता व्यक्त की। यह दिखाता है कि उसके मन में अपने परिवार के प्रति भावनाएं जटिल थीं—जहां एक ओर दर्द और गुस्सा था, वहीं दूसरी ओर प्रेम और जिम्मेदारी भी थी।

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए एक चेतावनी है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने आसपास के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं? क्या हम अपने बच्चों को समझने और उनकी भावनाओं को महत्व देने में सफल हो रहे हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक दबाव, अपमान और नियंत्रण किसी भी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। परिवारों को चाहिए कि वे अपने बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें और उन्हें समझने की कोशिश करें। अनुशासन जरूरी है, लेकिन यह संतुलित होना चाहिए।

कानपुर कचहरी में यह पिछले एक साल में दूसरी आत्महत्या की घटना है, जो यह दर्शाती है कि कार्यस्थल और व्यक्तिगत जीवन में तनाव का स्तर बढ़ रहा है। इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाने की जरूरत है, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

अंत में, प्रियांशु की मौत एक ऐसी त्रासदी है, जो हमें यह सिखाती है कि संवेदनशीलता, समझ और संवाद कितने जरूरी हैं। यदि हम अपने आसपास के लोगों के दर्द को समझने की कोशिश करें और उन्हें सहारा दें, तो शायद हम कई जिंदगियां बचा सकते हैं।

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