
भूजल में यूरेनियम की बढ़ती मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता, 18 राज्यों के 151 जिले प्रभावित
समाचार क्यारी (भारत)
देश में जल संकट के साथ अब जल गुणवत्ता से जुड़ी एक गंभीर समस्या भी सामने आ रही है। हाल ही में जारी एक विस्तृत निगरानी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत के कई राज्यों के भूजल में यूरेनियम की खतरनाक मात्रा पाई गई है। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। खासतौर पर वे लोग जो पीने के लिए भूजल पर निर्भर हैं, उनके लिए यह खतरा और अधिक गंभीर हो जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, देश के 18 राज्यों के कुल 151 जिले इस समस्या से आंशिक रूप से प्रभावित पाए गए हैं। इस अध्ययन में 14,000 से अधिक भूजल नमूनों की जांच की गई, जिसमें यूरेनियम की मात्रा 0 से लेकर 2,876 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई। यह स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पीने के पानी में यूरेनियम की अधिकतम स्वीकार्य मात्रा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए, लेकिन कई स्थानों पर यह सीमा 90 गुना से भी अधिक पाई गई।
इस पूरे अध्ययन को देश में पहली बार इतने बड़े स्तर पर अंजाम दिया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या पहले से मौजूद थी, लेकिन उसकी गंभीरता का सही आकलन अब जाकर सामने आया है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड द्वारा वर्ष 2019-20 में इस राष्ट्रीय स्तर की निगरानी की शुरुआत की गई थी, जिसके तहत नियमित रूप से भूजल के नमूनों की जांच की जा रही है। इस पहल का उद्देश्य न केवल स्थिति का आकलन करना है, बल्कि भविष्य में इसके समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाना भी है।
राज्यों की स्थिति पर नजर डालें तो पंजाब इस मामले में सबसे अधिक प्रभावित राज्य के रूप में सामने आया है। यहां कई स्थानों पर भूजल में यूरेनियम की मात्रा बेहद चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है। यदि परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड द्वारा तय 60 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सीमा को आधार मानें, तब भी पंजाब में लगभग 6 प्रतिशत कुओं में यह सीमा पार पाई गई है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि राज्य में भूजल की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित हो चुकी है।
दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। दिल्ली में लगभग 5 प्रतिशत और हरियाणा में 4.4 प्रतिशत कुओं में यूरेनियम की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसके अलावा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में भी विभिन्न स्तरों पर यह समस्या मौजूद है। हालांकि इन राज्यों में प्रतिशत कम है, लेकिन यह संकेत देता है कि समस्या देश के कई हिस्सों में फैल चुकी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक संरचना एक प्रमुख कारण है, क्योंकि कुछ क्षेत्रों की मिट्टी और चट्टानों में यूरेनियम प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है, जो धीरे-धीरे पानी में घुल जाता है। इसके अलावा अत्यधिक भूजल दोहन, औद्योगिक गतिविधियां और कृषि में रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग भी इस समस्या को बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं।
स्वास्थ्य के लिहाज से यह स्थिति बेहद गंभीर मानी जा रही है। लंबे समय तक यूरेनियम युक्त पानी का सेवन करने से सबसे अधिक असर किडनी पर पड़ता है। यूरेनियम एक भारी धातु होने के साथ-साथ रासायनिक रूप से विषैला भी होता है, जो शरीर में जाकर गुर्दों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा हड्डियों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। कुछ मामलों में लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम का रासायनिक विषाक्त प्रभाव उसके रेडियोधर्मी प्रभाव से अधिक खतरनाक होता है। इसका मतलब यह है कि इसका शरीर पर नुकसान मुख्य रूप से रासायनिक रूप में होता है, न कि केवल विकिरण के कारण। यही वजह है कि इसके सेवन को लेकर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और अधिक संवेदनशील माना जाता है। इन वर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे यूरेनियम के दुष्प्रभाव जल्दी और अधिक गंभीर रूप में सामने आ सकते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, जो पूरी तरह से भूजल पर निर्भर हैं, उनके लिए यह समस्या और अधिक चिंताजनक है।
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत में अभी तक यूरेनियम के लिए कोई स्पष्ट और सख्त राष्ट्रीय मानक निर्धारित नहीं किया गया है। जहां एक ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सीमा तय की है, वहीं भारतीय मानक ब्यूरो ने इस पर अभी तक कोई अलग मानक लागू नहीं किया है। यह स्थिति नीति निर्माण के स्तर पर एक बड़ी कमी को दर्शाती है, जिसे जल्द से जल्द दूर करने की आवश्यकता है।
सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए। इसके लिए सबसे पहले प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर वहां सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। इसके अलावा जल शुद्धिकरण तकनीकों को बढ़ावा देना, जागरूकता अभियान चलाना और भूजल के अत्यधिक दोहन पर नियंत्रण लगाना भी जरूरी कदम होंगे।
कुल मिलाकर, भूजल में यूरेनियम की बढ़ती मात्रा एक गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रही है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पड़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि इस दिशा में त्वरित और प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जा सके और इस खतरे को नियंत्रित किया जा सके।




