उत्तर प्रदेश

रेउना साइबर कांड का बड़ा खुलासा: 6 महीने में 40 लाख की ठगी, झोपड़ियों से चलता था फर्जी कॉल सेंटर

समाचार क्यारी (उत्तर प्रदेश, कानपुर)

कानपुर में सामने आए रेउना साइबर कांड ने यह साबित कर दिया है कि ठग अब हाईटेक तरीकों के साथ-साथ बेहद साधारण और छिपे हुए ठिकानों से भी बड़े अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। पुलिस जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि महज छह महीनों के भीतर 12 बैंक खातों के जरिए करीब 40 लाख रुपये का संदिग्ध लेनदेन किया गया। इस मामले में अब तक करीब 10 लाख रुपये फ्रीज किए जा चुके हैं, जबकि जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

रिश्तेदारों के नाम पर खुले खाते, उनमें घूमता था पैसा

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि साइबर अपराधियों ने अपने रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर विभिन्न बैंकों में कई खाते खुलवा रखे थे। इनमें ग्रामीण बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा शामिल हैं। इन खातों का इस्तेमाल ठगी से जुटाए गए पैसे को इधर-उधर ट्रांसफर करने के लिए किया जाता था।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इन खातों के जरिए बड़ी चालाकी से रकम को अलग-अलग अकाउंट्स में भेजा जाता था, ताकि जांच एजेंसियों को भ्रमित किया जा सके। इन खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था, जिनका संचालन गिरोह के सदस्य ऑनलाइन करते थे।

40 लाख का लेनदेन, कई खातों में फैला जाल

एडीसीपी एसओजी सुमित सुधाकर रामटेके के मुताबिक, गुरुवार को ग्रामीण बैंक और पंजाब नेशनल बैंक के 13 खातों का पता चला था, जिनसे करीब 40 लाख रुपये विभिन्न खातों में ट्रांसफर किए गए।

यह रकम करीब 40 अन्य बैंक खातों में भेजी गई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गिरोह का नेटवर्क काफी बड़ा और संगठित था। शुक्रवार को बैंक ऑफ बड़ौदा के 12 खातों की जानकारी भी सामने आई, जिनमें भी इसी तरह के संदिग्ध लेनदेन पाए गए हैं।

बैंक में पहुंची आरोपी की पत्नी, खुला नया राज

इस पूरे मामले में एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब बैंक ऑफ बड़ौदा की एक शाखा में जांच के दौरान एक महिला अचानक संदिग्ध खाते से पैसे निकालने पहुंच गई। बैंक मैनेजर ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने महिला को हिरासत में लेकर पूछताछ की। जांच में सामने आया कि यह खाता अशोक नामक आरोपी का था, जिसे पहले ही साइबर अपराध के आरोप में जेल भेजा जा चुका है। महिला उसकी पत्नी थी और खाते से पैसे निकालने आई थी।

हालांकि पूछताछ के बाद महिला को छोड़ दिया गया, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि गिरोह के सदस्य अभी भी सक्रिय रूप से अपने नेटवर्क को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। अशोक के खाते में करीब साढ़े छह लाख रुपये थे, जिन्हें पहले ही फ्रीज कर दिया गया था।

गांवों में छिपा था ठगी का अड्डा

पुलिस जांच में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि यह पूरा साइबर गिरोह शहरों में नहीं, बल्कि गांवों की झोपड़ियों और खंडहर जैसे मकानों में छिपकर काम करता था। घाटमपुर और कानपुर देहात के कई गांव इस गिरोह के ठिकाने बने हुए थे।

यहां से आरोपी फोन कॉल के जरिए लोगों को ठगते थे। दिन के साथ-साथ रात में भी ये लोग सक्रिय रहते थे, ताकि पुलिस और स्थानीय लोगों की नजर से बच सकें।

झोपड़ियों में मिला ‘कॉल सेंटर’ का सबूत

जब पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम ने रेउना थाना क्षेत्र के गांवों—रठिगांव, समाजनगर, लक्ष्मणपुर और लीलादास का पुरवा—में छापेमारी की, तो वहां से कई संदिग्ध वस्तुएं बरामद हुईं।

इन झोपड़ियों में चूल्हे, लकड़ियां, शराब की बोतलें, नमकीन के पैकेट और अन्य सामान मिला, जिससे यह संकेत मिला कि आरोपी यहां लंबे समय तक रुककर काम करते थे। यह किसी अस्थायी ठिकाने की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, जहां से कॉलिंग कर ठगी की जाती थी।

रात में चलता था पूरा ऑपरेशन

जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह के सदस्य खासतौर पर रात के समय सक्रिय होते थे। अंधेरे का फायदा उठाकर वे झोपड़ियों में बैठकर फोन कॉल करते थे और लोगों को झांसे में लेकर पैसे ऐंठते थे।

इस तरीके से वे पुलिस की नजर से भी बच जाते थे और आसानी से अपना नेटवर्क चला पाते थे। यह रणनीति काफी समय तक सफल रही, लेकिन अब पुलिस ने इसका पर्दाफाश कर दिया है।

दूसरे गिरोहों से भी जुड़े तार

पुलिस को यह भी पता चला है कि इस गिरोह के संबंध कानपुर देहात के अन्य सक्रिय साइबर गिरोहों से भी हैं। करीब चार महीने पहले क्राइम ब्रांच ने इसी इलाके से एक अन्य गिरोह को पकड़ा था, जो इसी तरह की ठगी में शामिल था।

अब जांच में यह सामने आ रहा है कि दोनों गिरोहों के बीच संपर्क था और वे एक-दूसरे की मदद से अपने नेटवर्क को बढ़ा रहे थे।

पुलिस की कार्रवाई तेज, जल्द होंगी गिरफ्तारियां

पुलिस ने इस मामले में अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। कई टीमों को गांवों में लगातार निगरानी और छापेमारी के निर्देश दिए गए हैं। फरार आरोपियों की तलाश जारी है और जल्द ही उन्हें गिरफ्तार करने का दावा किया जा रहा है।

गिरोह के सरगना सुशील कुमार के बारे में भी पुलिस जानकारी जुटा रही है। उसके साथ कई अन्य लोगों के नाम भी सामने आए हैं, जो फिलहाल फरार हैं।

साइबर अपराध का बदलता चेहरा

रेउना साइबर कांड यह दिखाता है कि अपराधी अब नई-नई रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाईटेक उपकरणों के साथ-साथ वे साधारण और नजरों से दूर जगहों का भी उपयोग कर रहे हैं, जिससे उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है।

यह मामला पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी एक चुनौती है, क्योंकि अब अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है।

निष्कर्ष

कानपुर का यह साइबर कांड न केवल एक बड़े ठगी नेटवर्क का खुलासा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अपराधी किस तरह नई-नई तरकीबें अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। 6 महीने में 40 लाख रुपये का खेल इस बात का प्रमाण है कि यह गिरोह कितना संगठित और सक्रिय था।

अब जरूरी है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो और लोगों को भी जागरूक किया जाए, ताकि वे इस तरह के साइबर अपराधों से बच सकें। पुलिस की तेजी से चल रही जांच से उम्मीद है कि जल्द ही इस गिरोह के सभी सदस्य कानून के शिकंजे में होंगे।

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