हिमाचल प्रदेश

हिमाचल के CBSE स्कूलों में गैर-शिक्षक स्टाफ की नियुक्ति का नया मॉडल: बिना नई भर्ती के 604 पद भरने की तैयारी

(समाचार क्यारी हिमाचल)

हिमाचल प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। Shimla से सामने आई जानकारी के अनुसार, राज्य के Central Board of Secondary Education (CBSE) से संबद्ध सरकारी स्कूलों में गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए अब पारंपरिक भर्ती प्रक्रिया नहीं अपनाई जाएगी। इसके बजाय विभाग ने आंतरिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए युक्तीकरण (रैशनलाइजेशन) और पदोन्नति का रास्ता चुना है।

स्कूल शिक्षा विभाग के निदेशक आशीष कोहली द्वारा तैयार इस प्रस्ताव को शिक्षा सचिव राकेश कंवर को भेजा गया है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद राज्य के 151 सीबीएसई से जुड़े सरकारी स्कूलों में गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इस योजना के तहत पहले चरण में 604 मिनिस्ट्रियल (गैर-शिक्षक) कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी।

इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह है कि स्कूलों में प्रशासनिक कार्यों को सुचारु रूप से संचालित किया जा सके और शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा सके। लंबे समय से यह शिकायत सामने आती रही है कि शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा कई प्रशासनिक काम भी करने पड़ते हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। सरकार इस बदलाव के जरिए इसी समस्या का समाधान करना चाहती है।

प्रस्ताव के अनुसार, प्रत्येक सीबीएसई स्कूल में अधीक्षक ग्रेड-1, अधीक्षक ग्रेड-2 और एक वरिष्ठ सहायक का एक-एक पद भरा जाएगा। इसके अलावा, लिपिक सह जेओए (आईटी) के चार पद भी हर स्कूल में नियुक्त किए जाएंगे। इस प्रकार कुल 604 पदों को इस नई व्यवस्था के तहत भरा जाएगा।

हालांकि, इस फैसले के पीछे एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि राज्य में पहले से ही बड़ी संख्या में गैर-शिक्षक पद खाली पड़े हैं। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, विभिन्न खंड प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी (BEEO) कार्यालयों में कुल 2105 मिनिस्ट्रियल पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 402 वरिष्ठ सहायक और 886 लिपिक के पद अभी तक खाली हैं। इसके बावजूद सरकार ने नई भर्ती के बजाय युक्तीकरण का विकल्प चुना है।

विभाग का तर्क है कि पिछले दो वर्षों में क्लस्टर प्रणाली लागू होने के कारण कार्यालयों में कार्यभार में कमी आई है। छात्र नामांकन में गिरावट और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण के चलते अब उतने कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं रह गई है जितनी पहले थी। ऐसे में विभाग ने मौजूदा स्टाफ को ही पुनर्व्यवस्थित करने का निर्णय लिया है।

प्रस्ताव के तहत जिन BEEO कार्यालयों में वरिष्ठ सहायक के पांच पद स्वीकृत हैं, वहां से दो पदों को अपग्रेड करके अधीक्षक ग्रेड-1 बनाया जाएगा। वहीं, जिन कार्यालयों में छह या उससे अधिक क्लर्क पद खाली हैं, वहां से अतिरिक्त क्लर्क या जेओए (आईटी) को हटाकर सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में स्थानांतरित किया जाएगा।

इस योजना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बहुत कम पड़ेगा। विभाग के अनुसार, 151 वरिष्ठ सहायकों को अधीक्षक ग्रेड-1 में अपग्रेड करने पर लगभग 2.81 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च आएगा। वहीं, क्लर्क और जेओए (आईटी) पदों के पुनर्संयोजन से कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होगा, क्योंकि यह केवल स्थानांतरण की प्रक्रिया है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में शिक्षकों को किसी भी प्रकार के गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाएगा। इसका सीधा फायदा छात्रों को मिलेगा, क्योंकि शिक्षक अब पूरी तरह पढ़ाई और शैक्षणिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। इससे स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है।

इसके साथ ही राज्य सरकार ने शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को भी गति दी है। सीबीएसई से जुड़े स्कूलों के लिए एक अलग सब-कैडर तैयार किया गया है। इस सब-कैडर में शामिल होने के लिए शिक्षकों को पहले एक निर्धारित परीक्षा पास करनी होगी। इसके बाद ही उनकी नियुक्ति इन स्कूलों में की जाएगी। कुछ पदों को सीधी भर्ती के माध्यम से भी भरा जा रहा है।

यह नई व्यवस्था न केवल प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाएगी, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण भी पेश करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल होता है, तो अन्य राज्यों में भी इसे अपनाया जा सकता है।

हालांकि, इस फैसले को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि जब इतने बड़े स्तर पर पद खाली हैं, तो नई भर्ती से युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते थे। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संसाधनों का सही उपयोग करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि अनावश्यक खर्च से बचा जा सके।

कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश सरकार का यह कदम शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी और परिणाममुखी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद यह योजना कितनी सफल होती है और क्या इससे वास्तव में स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आता है या नहीं।

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