उत्तर प्रदेश

गंगा एक्सप्रेसवे टोल पर तीन दिन में तीन फैसले: 1514 से 1800 और फिर 1765 रुपये, आखिर कौन-सी दर सही?

समाचार क्यारी (उत्तर प्रदेश, लखनऊ)

उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सड़क परियोजनाओं में शामिल Ganga Expressway एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह इसकी लंबाई या कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि टोल दरों में आई बार-बार की बदलाव है। महज तीन दिनों के भीतर तीन अलग-अलग दरें सामने आने से यात्रियों, ट्रांसपोर्टरों और आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।

शुरुआत से ही स्पष्टता का अभाव

गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 29 अप्रैल को प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा किया गया। उद्घाटन से पहले ही टोल दरों को लेकर चर्चा तेज हो गई थी, लेकिन जो दरें घोषित की गईं, वे स्थिर नहीं रह सकीं।

टोल निर्धारण की जिम्मेदारी Uttar Pradesh Expressways Industrial Development Authority (यूपीडा) के पास है। लेकिन तीन दिन में तीन बार दरों में बदलाव से यह साफ हो गया कि अंतिम निर्णय लेने में जल्दबाजी या असमंजस की स्थिति बनी रही।

पहली दर: गणना के आधार पर 1514 रुपये

सबसे पहले जो टोल दर घोषित की गई, वह पूरी तरह गणितीय आधार पर थी। एक्सप्रेसवे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है और प्रति किलोमीटर दर 2.55 रुपये तय की गई थी। इस हिसाब से कुल टोल 1514 रुपये बनता है।

यह दर कई लोगों को तार्किक और संतुलित लगी, क्योंकि यह दूरी और लागत के हिसाब से उचित मानी जा रही थी। ट्रांसपोर्ट सेक्टर ने भी इसे स्वीकार्य बताया।

दूसरा झटका: टोल बढ़कर 1800 रुपये

लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। अगले ही दिन टोल दरों में बड़ा बदलाव करते हुए कार, जीप और हल्के वाहनों के लिए शुल्क बढ़ाकर 1800 रुपये कर दिया गया।

इस अचानक बढ़ोतरी ने लोगों को चौंका दिया। कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब एक दिन पहले ही दरें तय की गई थीं, तो इतनी जल्दी बदलाव की क्या जरूरत थी? इस फैसले से यात्रियों में असंतोष भी देखने को मिला।

तीसरा संशोधन: 1765 रुपये पर आकर रुकी कीमत

लगातार उठ रहे सवालों के बीच तीसरे दिन फिर टोल दरों में बदलाव किया गया और इसे घटाकर 1765 रुपये कर दिया गया। हालांकि यह दर 1800 रुपये से कम है, लेकिन शुरुआती 1514 रुपये से अभी भी ज्यादा है।

इस तरह तीन दिनों में टोल दरों ने 1514 से 1800 और फिर 1765 रुपये तक का सफर तय किया, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।

निजी कंपनियों का हिस्सा

नवीनतम दरों के अनुसार, 1765 रुपये के टोल में विभिन्न कंपनियों का हिस्सा तय किया गया है। इसमें लगभग 1365 रुपये Adani Enterprises को और 440 रुपये IRB Infrastructure Developers को मिलेंगे।

यह दर्शाता है कि इस परियोजना में निजी निवेश भी शामिल है, और टोल दरें उनके रिटर्न को ध्यान में रखते हुए तय की जा रही हैं।

यात्रियों पर सीधा असर

बार-बार बदलती टोल दरों का सीधा असर यात्रियों की जेब पर पड़ता है। खासकर उन लोगों के लिए जो रोजाना या नियमित रूप से इस एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करेंगे, उनके लिए यह खर्च महत्वपूर्ण हो जाता है।

ट्रांसपोर्ट कंपनियों के लिए भी यह अनिश्चितता परेशानी का कारण बनती है। उन्हें अपने किराए और लॉजिस्टिक्स प्लान को बार-बार बदलना पड़ता है।

क्या महंगा है नया टोल?

यदि तुलना की जाए तो शुरुआती 1514 रुपये की दर सबसे सस्ती थी। इसके बाद 1800 रुपये की दर सबसे ज्यादा रही, जबकि 1765 रुपये बीच का रास्ता माना जा सकता है।

फिर भी, यह स्पष्ट है कि अंतिम दर शुरुआती गणना से अधिक है। यानी यात्रियों को अब ज्यादा भुगतान करना होगा।

परियोजना का महत्व कम नहीं

हालांकि टोल दरों को लेकर विवाद है, लेकिन गंगा एक्सप्रेसवे का महत्व कम नहीं होता। यह परियोजना उत्तर प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

यह एक्सप्रेसवे पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश को जोड़ते हुए यात्रा समय को काफी कम करेगा। इसके साथ ही औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

पारदर्शिता की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता बेहद जरूरी होती है। टोल दरों को लेकर बार-बार बदलाव से लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है।

सरकार और यूपीडा को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि दरों में बदलाव क्यों किया गया और अंतिम दर क्या होगी। इससे भ्रम की स्थिति खत्म होगी।

आगे क्या उम्मीद?

अब उम्मीद की जा रही है कि टोल दरों को जल्द ही अंतिम रूप दिया जाएगा और आगे कोई बदलाव नहीं होगा। यात्रियों को एक स्थिर और स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत है।

यदि भविष्य में दरों में बदलाव होता भी है, तो उसे एक तय प्रक्रिया के तहत और पहले से सूचना देकर किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

गंगा एक्सप्रेसवे जैसी बड़ी परियोजना से लोगों को काफी उम्मीदें हैं, लेकिन टोल दरों में बार-बार बदलाव ने इसकी शुरुआत को विवादों में ला दिया है। 1514 से 1800 और फिर 1765 रुपये तक का सफर यह दिखाता है कि निर्णय प्रक्रिया में अभी सुधार की जरूरत है।

अब यह देखना अहम होगा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस स्थिति को कैसे संभालती हैं और यात्रियों को कब एक स्थिर और भरोसेमंद टोल व्यवस्था मिलती है।

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