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गेहूं खरीद पर टकराव: आढ़तियों की हड़ताल से पंजाब की कृषि व्यवस्था पर मंडराया संकट

पंजाब, जिसे देश का “अन्न भंडार” कहा जाता है, इस समय एक गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। रबी सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद की शुरुआत तो हो चुकी है, लेकिन इसके साथ ही आढ़तियों की हड़ताल ने पूरे सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। जहां सरकार किसानों को आश्वस्त करने में लगी है, वहीं आढ़ती अपने अधिकारों और मांगों को लेकर अड़े हुए हैं। इस टकराव ने न केवल खरीद प्रक्रिया को प्रभावित किया है, बल्कि राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं

हर साल की तरह इस बार भी गेहूं की फसल अच्छी हुई है और किसानों को उम्मीद है कि उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा। केंद्र सरकार ने पंजाब के लिए 122 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीद का लक्ष्य तय किया है, जबकि राज्य सरकार ने इससे अधिक 132 लाख मीट्रिक टन खरीदने की तैयारी की है। लेकिन यह लक्ष्य तभी संभव है जब मंडियों में खरीद प्रक्रिया सुचारू रूप से चले, जिसमें आढ़तियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले मंत्री लाल चंद कटारूचक ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार ने आढ़तियों की मांगों को पूरी गंभीरता से लिया है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस मुद्दे को केंद्र सरकार के सामने उठाया था और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस पर चर्चा की थी।

इस बातचीत के बाद आढ़तियों के कमीशन में 4.75 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। सरकार इसे एक सकारात्मक कदम मान रही है और उम्मीद कर रही है कि इससे आढ़ती संतुष्ट होंगे। लेकिन हकीकत इससे अलग नजर आ रही है। आढ़ती संगठन इस बढ़ोतरी को नाकाफी बताते हुए अपनी हड़ताल जारी रखे हुए हैं।

आढ़ती एसोसिएशन के नेताओं का कहना है कि उनका काम केवल खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। वे किसानों को भुगतान दिलाने, फसल के भंडारण और परिवहन की व्यवस्था करने, और मंडियों के संचालन में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उन्हें मिलने वाला कमीशन उनकी जिम्मेदारियों के हिसाब से होना चाहिए। उनका साफ कहना है कि जब तक उन्हें 2.50 प्रतिशत कमीशन नहीं मिलेगा, तब तक वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे।

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ रहा है। खेतों से कटकर मंडियों में पहुंच रही गेहूं की फसल अब खरीद के इंतजार में पड़ी है। कई जगहों पर मंडियां भर चुकी हैं और किसानों को अपनी फसल रखने के लिए जगह तक नहीं मिल रही। इससे फसल खराब होने का खतरा बढ़ रहा है और किसानों की चिंता भी।

सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा लिया है। मंत्री लाल चंद कटारूचक ने कहा कि सरकारी एजेंसियों को सीधे खरीद में लगाया जा रहा है, ताकि आढ़तियों की अनुपस्थिति में भी प्रक्रिया जारी रखी जा सके। इसके अलावा, राज्य में 1897 खरीद केंद्र अधिसूचित किए गए हैं और 266 अस्थायी यार्ड बनाए गए हैं।

सरकार ने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि किसानों को भुगतान में देरी न हो। इसके लिए केंद्र सरकार से 30,973 करोड़ रुपये की नकद ऋण सीमा पहले ही प्राप्त कर ली गई है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो किसानों को एक निश्चित आय की गारंटी देता है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी एजेंसियों के भरोसे इतने बड़े पैमाने पर खरीद करना व्यावहारिक नहीं है। आढ़तियों का अनुभव और नेटवर्क इस सिस्टम का अहम हिस्सा है। उनकी गैरमौजूदगी से खरीद प्रक्रिया की गति धीमी पड़ सकती है और कई तकनीकी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

स्थिति को और जटिल बनाते हुए सरकार ने सीमा क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं। आशंका है कि दूसरे राज्यों से गेहूं लाकर पंजाब की मंडियों में बेचा जा सकता है, जिससे स्थानीय किसानों को नुकसान हो सकता है। इस पर रोक लगाने के लिए पुलिस और प्रशासन को अलर्ट पर रखा गया है।

इस संकट का असर केवल किसानों और आढ़तियों तक सीमित नहीं है। मंडियों में काम करने वाले मजदूर, ट्रांसपोर्टर और छोटे व्यापारी भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। खरीद प्रक्रिया धीमी होने से उनके काम पर भी असर पड़ रहा है, जिससे उनकी आय में कमी आ सकती है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह मुद्दा काफी अहम बन गया है। विपक्षी दल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया। उनका कहना है कि अगर सरकार पहले ही आढ़तियों के साथ बातचीत कर लेती, तो आज यह स्थिति नहीं बनती।

वहीं सरकार का कहना है कि वह लगातार आढ़तियों के संपर्क में है और जल्द ही कोई समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है। सरकार को उम्मीद है कि बातचीत के जरिए इस गतिरोध को खत्म किया जा सकेगा और खरीद प्रक्रिया सामान्य हो जाएगी।

यह पूरा घटनाक्रम पंजाब की कृषि व्यवस्था की जटिलता को उजागर करता है। यहां हर एक कड़ी—किसान, आढ़ती, सरकारी एजेंसियां और मजदूर—एक दूसरे पर निर्भर हैं। अगर इनमें से कोई एक भी कड़ी कमजोर पड़ती है, तो इसका असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है।

फिलहाल, सबसे बड़ी जरूरत यह है कि सभी पक्ष आपसी संवाद के जरिए इस समस्या का समाधान निकालें। किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द हड़ताल खत्म होनी चाहिए, ताकि खरीद प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी हो सके।

अंततः, यह केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भरोसे और सहयोग की परीक्षा भी है। अगर सरकार और आढ़ती मिलकर इस संकट का समाधान निकालते हैं, तो यह भविष्य के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा। लेकिन अगर यह टकराव लंबा खिंचता है, तो इसका खामियाजा सबसे ज्यादा किसानों को भुगतना पड़ेगा।

पंजाब के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह संकट कैसे सुलझता है और क्या राज्य अपनी मजबूत कृषि परंपरा को बनाए रखने में सफल रहता है या नहीं।

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