
32 साल बाद जागी न्याय की उम्मीद: बिना अपील जेल में रहा दोषी, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया व्यक्ति करीब 32 वर्षों तक जेल में बंद रहा, लेकिन इस दौरान उसने अपनी सजा के खिलाफ अपील तक दाखिल नहीं की। जब आखिरकार मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्याय में इतनी लंबी देरी किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जा सकती।

यह मामला रमेश नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1993 में करनाल की एक अदालत ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। आरोप था कि उसने अपने पिता फूल सिंह के साथ मिलकर पुरानी रंजिश के चलते एक व्यक्ति पर चाकू से हमला किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी।
अदालत के फैसले के बाद रमेश को जेल भेज दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इतने लंबे समय तक उसने अपनी सजा के खिलाफ अपील ही दाखिल नहीं की। यह देरी करीब 11,740 दिनों यानी लगभग 32 वर्षों की थी।
जब मार्च 2026 में यह मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में आया, तो अदालत ने इस पर गंभीर चिंता जताई। जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में इतनी लंबी देरी न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि यह एक व्यक्ति के अधिकारों का भी उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई दोषी खुद अपील दाखिल नहीं कर पाता, तो यह जिम्मेदारी जेल प्रशासन की होती है कि वह उसे कानूनी सहायता उपलब्ध कराए और उसकी अपील समय पर दाखिल करवाई जाए। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ, जो कि बेहद चिंताजनक है।
हाईकोर्ट ने कानूनी सहायता प्रणाली की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि इस लापरवाही का खामियाजा दोषी को नहीं भुगतना चाहिए।
कोर्ट ने 32 साल की देरी को माफ करते हुए रमेश की अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। साथ ही ट्रायल कोर्ट से संबंधित सभी रिकॉर्ड तलब कर लिए गए हैं, ताकि मामले की विस्तार से सुनवाई की जा सके।
इस मामले की अगली सुनवाई 2 मई को तय की गई है।
दिलचस्प बात यह है कि यह मामला इतने वर्षों बाद सामने कैसे आया। दरअसल, करनाल जिला जेल के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने मार्च 2026 में रमेश की अपील से संबंधित एक अर्जी हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को भेजी थी। इसके बाद इस केस को अधिवक्ता संजीव शर्मा को सौंपा गया।
जब वकील ने केस के दस्तावेज तैयार किए, तब यह सामने आया कि अपील दाखिल करने में करीब 32 वर्षों की देरी हो चुकी है। इसके बाद कोर्ट में देरी माफ करने की अर्जी दी गई, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने इस मामले में करनाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को भी निर्देश दिए हैं कि वे यह स्पष्ट करें कि इतने वर्षों तक अपील क्यों दाखिल नहीं की गई और इस दौरान संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि न्याय प्रणाली में सुधार की कितनी आवश्यकता है। अदालत ने साफ कहा कि हर कैदी को समय पर न्याय पाने का अधिकार है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा।




