
दिल्ली में सरकारी वाहनों की लापरवाही उजागर—बिना पीयूसी दौड़ रहीं गाड़ियां, एनजीटी तक पहुंचा मामला
(समाचार क्यारी दिल्ली)
देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। यहां सरकारी विभागों की कई गाड़ियां बिना वैध प्रदूषण प्रमाणपत्र (पीयूसी) के सड़कों पर चल रही हैं। यह मामला तब और गंभीर हो गया जब इसकी रिपोर्ट राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष पेश की गई। नियमों की अनदेखी करते हुए चल रहे इन वाहनों पर अब तक 60 चालान भी किए जा चुके हैं।

रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा
दिल्ली परिवहन विभाग की ओर से दाखिल रिपोर्ट में बताया गया कि कई सरकारी वाहन लंबे समय से बिना पीयूसी के चल रहे हैं। संयुक्त आयुक्त मुकेश द्वारा प्रस्तुत इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि नवंबर 2024 में जब इस मामले को लेकर याचिका दायर की गई थी, उस समय अधिकांश सरकारी वाहनों के पास वैध पीयूसी प्रमाणपत्र नहीं था।
हालांकि, बाद में कुछ विभागों ने इस दिशा में कदम उठाते हुए अपने वाहनों के पीयूसी बनवाए, लेकिन स्थिति अभी भी पूरी तरह से सुधरी नहीं है। अब भी कई वाहन ऐसे हैं, जो बिना प्रदूषण प्रमाणपत्र के ही सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
नियमों की अनदेखी, 60 वाहनों पर चालान
प्रदूषण नियंत्रण नियमों का उल्लंघन करने वाले 60 सरकारी वाहनों के चालान किए जा चुके हैं। यह कार्रवाई इस बात को दर्शाती है कि नियमों के पालन में सरकारी स्तर पर भी लापरवाही बरती जा रही है।
केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत हर वाहन के लिए वैध पीयूसी प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है। इसके बावजूद सरकारी वाहनों द्वारा इस नियम की अनदेखी चिंता का विषय बन गई है।
पुराने वाहनों से बढ़ रहा प्रदूषण
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई पुराने वाहन अब भी सड़कों पर चल रहे हैं। इनमें बीएस-3 और बीएस-4 श्रेणी के वाहन शामिल हैं, जो अधिक प्रदूषण फैलाते हैं। कुछ वाहनों को कंडेम्न घोषित कर उनका पंजीकरण रद्द किया जा चुका है या उन्हें स्क्रैप किया गया है, लेकिन कई पुराने वाहन अब भी उपयोग में हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के पुराने वाहन वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं और पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रही दिल्ली के लिए यह स्थिति और खतरनाक हो सकती है।
प्रशासन की सख्ती, जारी हुए आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने 7 अप्रैल 2026 को सख्त निर्देश जारी किए। सभी विभागों, बोर्ड, निगम और सरकारी संस्थानों को स्पष्ट रूप से कहा गया कि बिना वैध पीयूसी प्रमाणपत्र वाले वाहनों का उपयोग किसी भी सरकारी कार्य में न किया जाए।
यह आदेश केवल सरकारी वाहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि किराए और आउटसोर्स किए गए वाहनों पर भी समान रूप से लागू होगा। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि हर स्तर पर नियमों का पालन हो।
पीयूसी नवीनीकरण के लिए तय समयसीमा
सरकार ने सभी विभागों को अपने वाहनों का पीयूसी प्रमाणपत्र नवीनीकरण कराने के लिए 10 अप्रैल 2026 तक की समयसीमा दी थी। साथ ही, इस जिम्मेदारी को संबंधित विभागाध्यक्षों को सौंपा गया है, ताकि लापरवाही की गुंजाइश न रहे।
यह कदम प्रशासन की ओर से एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि अब नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
याचिकाकर्ता ने उठाया मुद्दा
इस पूरे मामले को सामने लाने में याचिकाकर्ता जितेंद्र महाजन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने इस मुद्दे को उठाते हुए 106 सरकारी वाहनों की सूची भी पेश की, जिनमें से कई वाहन 10 से 15 साल पुराने हैं।
इन वाहनों के संचालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि इतने पुराने वाहन न केवल अधिक प्रदूषण फैलाते हैं, बल्कि उनकी स्थिति भी अक्सर ठीक नहीं होती।
प्रदूषण नियंत्रण पर उठे सवाल
दिल्ली पहले से ही देश के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल है। ऐसे में जब सरकारी वाहन ही नियमों का पालन नहीं करेंगे, तो आम लोगों से उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है।
यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है। अगर नियमों को लागू करने वाली एजेंसियां ही उनका पालन नहीं करेंगी, तो प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।
आगे की कार्रवाई पर नजर
अब इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण इस मामले की सुनवाई कर रहा है और संभव है कि वह सख्त निर्देश जारी करे।
यदि नियमों का उल्लंघन जारी रहता है, तो संबंधित विभागों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है।
निष्कर्ष
दिल्ली में सरकारी वाहनों द्वारा बिना पीयूसी के संचालन का यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
यह घटना यह दिखाती है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल नीतियां बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन कराना भी जरूरी है। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इस मामले में ठोस कदम उठाए और यह सुनिश्चित करे कि सभी वाहन, चाहे वे सरकारी हों या निजी, नियमों का पूरी तरह पालन करें।
अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो इसका असर न केवल पर्यावरण पर पड़ेगा, बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य पर भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं।




