उत्तर प्रदेश

कोर्ट जाते वक्त दुष्कर्म पीड़िता को प्रसव पीड़ा, अस्पताल में बच्चे को दिया जन्म

समाचार क्यारी (उतर प्रदेश, मेरठ)

मेरठ में एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां दुष्कर्म पीड़िता को कोर्ट में बयान देने के लिए ले जाया जा रहा था, लेकिन इसी दौरान उसे अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। हालात ऐसे बने कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा, जहां उसने एक बच्चे को जन्म दिया। यह घटना न केवल पुलिस और प्रशासन के लिए अप्रत्याशित थी, बल्कि वहां मौजूद लोगों के लिए भी भावनात्मक रूप से झकझोर देने वाली साबित हुई।

जानकारी के अनुसार, पीड़िता नौ माह की गर्भवती थी और उसे उसके बयान दर्ज कराने के लिए कोर्ट ले जाया जा रहा था। जैसे ही वह कचहरी परिसर में पहुंची, उसे तेज दर्द शुरू हो गया। स्थिति को गंभीर देखते हुए पुलिसकर्मियों ने बिना देर किए उसे जिला महिला अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों की देखरेख में कुछ ही समय बाद पीड़िता ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

यह मामला पिछले साल अगस्त महीने से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि क्षेत्र के एक युवक ने किशोरी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना को अंजाम देने के लिए उसने एक स्थानीय मंडप में कमरा लिया था, जहां यह वारदात हुई। पीड़िता ने जब विरोध किया और शिकायत की बात कही, तो आरोपी ने उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी।

डर और सामाजिक दबाव के कारण पीड़िता और उसका परिवार लंबे समय तक चुप रहा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और जब पीड़िता गर्भवती हो गई, तब परिवार को इस घटना की जानकारी मिली। बताया जाता है कि जब गर्भ पांच महीने का हो गया, तब जाकर घरवालों को सच्चाई का पता चला। इसके बाद भी आरोपी पक्ष की धमकियों के कारण परिवार ने तुरंत पुलिस में शिकायत नहीं की।

हालांकि, जब मामला आसपास के लोगों के बीच चर्चा का विषय बनने लगा, तब परिवार ने हिम्मत जुटाकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी युवक और मंडप के मालिक के खिलाफ दुष्कर्म और पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

मामले की जांच के दौरान पीड़िता को बाल कल्याण समिति (CWC) के सामने भी पेश किया गया, जहां उसकी स्थिति और सुरक्षा को लेकर निर्णय लिया गया। इसके बाद उसे कोर्ट में बयान देने के लिए ले जाया जा रहा था, लेकिन इसी दौरान यह अप्रत्याशित घटना हो गई।

अस्पताल में इलाज के दौरान पीड़िता और नवजात दोनों की स्थिति स्थिर बताई जा रही है। डॉक्टरों ने समय पर इलाज मिलने को राहत की बात बताया। वहीं, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पीड़िता के इलाज और देखभाल की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की ओर से उठाई जा रही है।

घटना के बाद बाल कल्याण समिति ने पीड़िता को उसके परिवार के सुपुर्द कर दिया है। साथ ही यह निर्देश भी दिए गए हैं कि उसके इलाज और सुरक्षा में कोई कमी न रहे। पुलिस ने भरोसा दिलाया है कि इस मामले में मजबूत पैरवी की जाएगी, ताकि आरोपितों को सख्त सजा मिल सके।

इस घटना ने एक बार फिर समाज में महिलाओं और विशेष रूप से नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला यह भी दर्शाता है कि डर, सामाजिक दबाव और धमकियों के कारण कई बार पीड़ित परिवार समय पर न्याय की प्रक्रिया शुरू नहीं कर पाते, जिससे हालात और जटिल हो जाते हैं।

साथ ही, यह घटना पुलिस और प्रशासन की तत्परता को भी दिखाती है, जिसने समय रहते पीड़िता को अस्पताल पहुंचाकर उसकी और बच्चे की जान बचाई। हालांकि, यह भी जरूरी है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को मानसिक और सामाजिक सहयोग भी मिले, ताकि वे बिना किसी डर के न्याय की लड़ाई लड़ सकें।

फिलहाल, पीड़िता ने यह इच्छा जताई है कि वह अपने बच्चे की परवरिश खुद करेगी। यह निर्णय उसके साहस और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। वहीं, प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी है कि उसे हर संभव सहायता और सुरक्षा प्रदान की जाए।

कुल मिलाकर, यह घटना एक तरफ जहां दर्दनाक और चिंताजनक है, वहीं दूसरी ओर यह न्याय व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता और संवेदनशीलता की जरूरत को भी उजागर करती है।

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