
मानसिक स्थिति बनी अहम वजह—नवजात की मौत मामले में मां को कोर्ट से राहत
(समाचार क्यारी पंजाब)
पंजाब के मोहाली से एक बेहद संवेदनशील और दिल दहला देने वाला मामला सामने आया, जिसमें तीन दिन की मासूम बच्ची की मौत के मामले में अदालत ने आरोपी मां को बरी कर दिया। इस फैसले ने जहां एक ओर लोगों को चौंकाया, वहीं दूसरी ओर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा भी छेड़ दी है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि घटना के समय महिला की मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी, इसलिए उसे हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला वर्ष 2023 का है, जब नयागांव के वाड़ी करोरां क्षेत्र में रहने वाले राज कुमार ने पुलिस को शिकायत दी थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी अनीता ने उनकी तीन दिन की नवजात बच्ची को जिंदा मिट्टी में दबा दिया। इस घटना के बाद बच्ची को तुरंत बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
घटना के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का केस दर्ज किया और जांच शुरू की। प्रारंभिक जांच में यह मामला एक जघन्य अपराध के रूप में सामने आया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया था।
मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायालय में हुई, जहां अभियोजन और बचाव पक्ष ने अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए। अभियोजन पक्ष का कहना था कि महिला ने जानबूझकर अपनी बच्ची की हत्या की है और उसे सख्त सजा दी जानी चाहिए। उनके अनुसार, यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया अपराध था।
वहीं बचाव पक्ष ने पूरी तरह अलग दलील पेश की। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी महिला लंबे समय से मानसिक बीमारी से पीड़ित थी और घटना के समय उसकी मानसिक स्थिति बेहद असामान्य थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि महिला को अपने कृत्य के परिणामों की समझ नहीं थी, इसलिए उसे अपराधी नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान सबसे अहम भूमिका मेडिकल साक्ष्यों की रही। अदालत में डॉक्टरों की टीम द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि अनीता कई वर्षों से मानसिक रोग से जूझ रही थी। रिपोर्ट के अनुसार, घटना के समय वह साइकोटिक लक्षणों से प्रभावित थी, जिससे उसकी सोचने-समझने की क्षमता काफी प्रभावित हो चुकी थी।
डॉक्टरों ने यह भी बताया कि महिला को अपनी गर्भावस्था तक का सही एहसास नहीं था। इसका मतलब यह था कि वह मानसिक रूप से इतनी अस्थिर थी कि उसे अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का भी सही बोध नहीं हो पा रहा था। ऐसे में यह मानना मुश्किल था कि उसने जानबूझकर कोई अपराध किया हो।
अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर भी जोर दिया कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। यानी घटना को किसी ने अपनी आंखों से होते हुए नहीं देखा था। पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, जो अपने आप में निर्णायक नहीं माने जाते, खासकर तब जब बचाव पक्ष मजबूत मेडिकल प्रमाण पेश कर दे।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपी महिला को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जब यह साबित हो चुका है कि घटना के समय महिला की मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने अनीता को बरी करने का आदेश दिया और कहा कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
इस फैसले के बाद समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायसंगत मानते हैं, क्योंकि मानसिक बीमारी को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया गया है। वहीं कुछ लोग इसे दुखद मानते हैं कि एक मासूम की जान चली गई और किसी को सजा नहीं मिली।
यह मामला मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को भी उजागर करता है। अक्सर समाज में मानसिक बीमारियों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, लेकिन इस घटना ने यह दिखा दिया कि अगर समय पर इलाज और देखभाल न मिले, तो इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्तियों के लिए परिवार और समाज दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे उन्हें सही इलाज और सहारा दें। यदि ऐसा न किया जाए, तो न केवल मरीज बल्कि उसके आसपास के लोग भी खतरे में पड़ सकते हैं।
यह घटना एक परिवार की त्रासदी है, जिसने एक मासूम की जान ले ली। साथ ही, यह समाज के लिए एक चेतावनी भी है कि मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना कितना खतरनाक हो सकता है।
फिलहाल, अदालत के फैसले के बाद मामला कानूनी रूप से समाप्त हो चुका है, लेकिन यह घटना लंबे समय तक लोगों के दिलों और दिमाग में बनी रहेगी। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने आसपास के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पर्याप्त संवेदनशील हैं या नहीं।




