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मानसून 2026: असमान बारिश, तेज़ गर्मी और दोहरी मार से जूझेगी खेती

समाचार क्यारी (भारत)

साल 2026 का मानसून भारत और दक्षिण एशिया के लिए एक जटिल और चुनौतीपूर्ण तस्वीर पेश कर रहा है। शुरुआती मौसम पूर्वानुमान यह संकेत दे रहे हैं कि इस बार बारिश का पैटर्न सामान्य नहीं रहेगा। कहीं बारिश कम होगी, तो कहीं बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा देखने को मिल सकती है। इस तरह का असंतुलन न केवल खेती को प्रभावित करेगा, बल्कि जल संकट, बाढ़ और स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा सकता है।

World Meteorological Organization (डब्ल्यूएमओ) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2026 के मानसून में अनिश्चितता बनी रह सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया में जून से सितंबर के दौरान औसत वर्षा में कमी देखने को मिल सकती है। इसके साथ ही दिन और रात दोनों समय तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है। इसका मतलब यह है कि लोगों को चौबीसों घंटे गर्मी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे जीवनशैली और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होंगे।

भारत के लिए भी हालात आसान नहीं दिख रहे। India Meteorological Department (आईएमडी) ने अपने पहले दीर्घकालिक पूर्वानुमान में मानसून के कमजोर रहने की संभावना जताई है। खासकर मध्य भारत, जो देश का प्रमुख कृषि क्षेत्र है, वहां कम बारिश का खतरा अधिक है। यह क्षेत्र धान, सोयाबीन और दालों जैसी फसलों के लिए जाना जाता है, जो सीधे मानसून पर निर्भर करती हैं।

हालांकि कुछ क्षेत्रों में राहत की संभावना भी है। उत्तर-पूर्व भारत, उत्तर-पश्चिमी हिस्से और दक्षिण के कुछ राज्यों में सामान्य या उससे अधिक वर्षा हो सकती है। लेकिन यह राहत पूरे देश के लिए पर्याप्त नहीं होगी, क्योंकि बारिश का वितरण असमान रहेगा। इस तरह की स्थिति में जहां एक तरफ सूखा पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर अचानक आई भारी बारिश से बाढ़ का खतरा भी बढ़ेगा।

दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर आधारित है। यहां सालभर की कुल वर्षा का लगभग 75 से 90 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच ही होता है। अगर इस अवधि में वर्षा कम होती है, तो इसका असर सीधे कृषि उत्पादन, जल आपूर्ति और ग्रामीण आय पर पड़ता है। जलाशयों में पानी की कमी हो सकती है, जिससे सिंचाई और पीने के पानी की समस्या बढ़ेगी। इसके अलावा बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ेगा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जलविद्युत परियोजनाएं प्रमुख स्रोत हैं।

इस बार सबसे बड़ी चिंता मानसून के असंतुलित स्वरूप को लेकर है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है और फिर अचानक कुछ दिनों में भारी बारिश हो सकती है। इस तरह की स्थिति में फसलें या तो पानी की कमी से सूख जाएंगी या फिर बाढ़ में बह सकती हैं। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है और खाद्यान्न उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।

बढ़ती गर्मी इस संकट को और गंभीर बना रही है। तापमान के सामान्य से अधिक रहने के कारण लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं। दिन में तेज धूप और रात में भी गर्मी बने रहने से शरीर को आराम नहीं मिल पाता, जिससे हीट स्ट्रेस और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ता है। बुजुर्ग, बच्चे और पहले से बीमार लोग इस स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक अहम कारण El Niño है। यह एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। भारत में आमतौर पर अल नीनो के दौरान मानसून कमजोर पड़ जाता है, जिससे बारिश कम होती है और गर्मी बढ़ जाती है।

इसके अलावा वैज्ञानिक “स्प्रिंग प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर” की भी बात कर रहे हैं। यह मार्च से मई के बीच का वह समय होता है जब समुद्र और वायुमंडल में तेजी से बदलाव होते हैं। इस दौरान मौसम के दीर्घकालिक पूर्वानुमान पूरी तरह सटीक नहीं होते। यानी आगे चलकर पूर्वानुमान में बदलाव संभव है, लेकिन फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, वे सतर्क रहने की जरूरत को दर्शाते हैं।

इस स्थिति में किसानों के लिए रणनीति बदलना जरूरी हो गया है। उन्हें ऐसी फसलों का चयन करना होगा जो कम पानी में भी उग सकें। साथ ही जल संरक्षण के उपाय अपनाने होंगे, जैसे कि वर्षा जल संचयन और ड्रिप सिंचाई तकनीक का इस्तेमाल। इसके अलावा मौसम की जानकारी पर नजर रखना भी बेहद जरूरी होगा, ताकि सही समय पर बुवाई और कटाई की जा सके।

सरकार को भी इस चुनौती से निपटने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी। सिंचाई परियोजनाओं को मजबूत करना, जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन और किसानों को समय पर सहायता देना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही आपदा प्रबंधन तंत्र को भी मजबूत करना होगा, ताकि बाढ़ या सूखे की स्थिति में तुरंत राहत पहुंचाई जा सके।

शहरी क्षेत्रों में भी इस बदलाव का असर साफ दिखाई देगा। पानी की कमी, बिजली की बढ़ती मांग और गर्मी से जुड़ी समस्याएं आम हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी और पानी व ऊर्जा का सही उपयोग करना होगा।

अंततः 2026 का मानसून एक चेतावनी है कि बदलते जलवायु परिदृश्य में हमें अपनी तैयारी को और मजबूत करना होगा। यह केवल किसानों की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे समाज की चुनौती है। अगर समय रहते सही कदम उठाए जाएं, तो इस संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है और भविष्य के लिए बेहतर रणनीति तैयार की जा सकती है।

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