
बांधवारी लैंडफिल प्रबंधन: दो नई कंपनियों को 63-63 करोड़ का ठेका, इको ग्रीन का टेंडर रद्द
डेस्क | हरियाणा समाचार
हरियाणा सरकार ने कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ा और अहम फैसला लेते हुए गुरुग्राम–फरीदाबाद सीमा पर स्थित बांधवारी लैंडफिल साइट के प्रबंधन, बॉयो-माइनिंग और कचरा निस्तारण की जिम्मेदारी दो नई कंपनियों को सौंप दी है। सरकार ने प्रत्येक कंपनी को 63-63 करोड़ रुपये का ठेका दिया है। इससे पहले यह कार्य इको ग्रीन कंपनी के पास था, लेकिन उसकी खराब परफॉर्मेंस के चलते सरकार ने अगस्त 2024 में उसका अनुबंध रद्द कर दिया था।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब बांधवारी लैंडफिल देश के सबसे बड़े और खतरनाक कचरा पहाड़ों में गिना जाने लगा है और इससे आसपास के इलाकों में पर्यावरण प्रदूषण, स्वास्थ्य समस्याएं और भूजल दूषित होने जैसी गंभीर दिक्कतें सामने आ रही हैं।
विधानसभा में उठा बांधवारी लैंडफिल का मुद्दा
बुधवार को हरियाणा विधानसभा में इस गंभीर मुद्दे को कुलदीप वत्स, कांग्रेस विधायक (बादली) ने प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि पहले जिन कंपनियों को कूड़ा उठान और निस्तारण का ठेका दिया गया था, उन्होंने जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी काम नहीं किया।
कुलदीप वत्स ने कहा कि बांधवारी में कूड़े का विशाल पहाड़ बन चुका है, जिससे आसपास के गांवों और शहरी इलाकों में दुर्गंध, जहरीली गैसें और गंभीर बीमारियां फैल रही हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछले ठेके में धांधली हुई है और इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए।
सरकार का जवाब: इको ग्रीन की परफॉर्मेंस रही खराब
सरकार की ओर से उद्योग एवं पर्यावरण मामलों से जुड़े मंत्री विपुल गोयल ने सदन में स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 में इको ग्रीन कंपनी को 330 करोड़ रुपये में बांधवारी लैंडफिल के प्रबंधन और कचरा निस्तारण का ठेका दिया गया था।
हालांकि, कई वर्षों तक काम करने के बावजूद कंपनी की परफॉर्मेंस संतोषजनक नहीं रही। निर्धारित समय में बॉयो-माइनिंग और कचरा निस्तारण का काम पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते कचरे का अंबार और बढ़ता चला गया।
विपुल गोयल ने बताया कि इन्हीं कारणों से 14 अगस्त 2024 को इको ग्रीन का ठेका रद्द कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि ठेका रद्द होने के बाद इको ग्रीन कंपनी ने सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सरकार ने कोर्ट में यह दलील दी कि बांधवारी लैंडफिल की स्थिति बेहद गंभीर है और नए ठेकेदारों की नियुक्ति जनहित में जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद ही सरकार ने नए कांट्रेक्टरों को ठेका देने की प्रक्रिया पूरी की।
14 लाख टन कचरे के निस्तारण का लक्ष्य
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद अब सरकार ने 14 लाख टन पुराने कचरे के निस्तारण का ठेका दो नई कंपनियों को दिया है।
- प्रत्येक कंपनी को 63 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा
- एक कंपनी ने काम शुरू भी कर दिया है
- दूसरी कंपनी मार्च महीने से काम शुरू करेगी
सरकार के अनुसार, दोनों कंपनियों को 2027 तक अपना काम पूरा करना होगा।
बांधवारी में कचरे की भयावह स्थिति
विधानसभा में जब कूड़े के पहाड़ को लेकर सवाल उठा, तो विपुल गोयल ने बताया कि फिलहाल बांधवारी लैंडफिल साइट पर करीब 16 लाख टन कचरा जमा है।
इतना ही नहीं, गुरुग्राम और फरीदाबाद से रोजाना 4,000 टन से अधिक नया कचरा भी यहां पहुंच रहा है। ऐसे में समस्या सिर्फ पुराने कचरे की नहीं, बल्कि लगातार बढ़ते नए कचरे की भी है।
चरणबद्ध तरीके से होगा कचरा निस्तारण
सरकार का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में कचरे का निस्तारण एक साथ संभव नहीं है। इसलिए इसे चरणबद्ध (फेज़-वाइज) तरीके से किया जा रहा है।
नई कंपनियां बॉयो-माइनिंग तकनीक के जरिए पुराने कचरे को अलग-अलग हिस्सों में बांटेंगी—
- उपयोगी सामग्री
- रीसाइक्लेबल वेस्ट
- और निस्तारण योग्य अवशेष
इस प्रक्रिया से कचरे के पहाड़ को धीरे-धीरे खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़ेगा सकारात्मक असर
बांधवारी लैंडफिल लंबे समय से पर्यावरणीय संकट का प्रतीक बना हुआ है। आसपास के गांवों में सांस संबंधी बीमारियां, त्वचा रोग और जल प्रदूषण की शिकायतें आम हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बॉयो-माइनिंग और वैज्ञानिक तरीके से कचरा निस्तारण किया जाता है, तो इससे—
- जहरीली गैसों का उत्सर्जन कम होगा
- भूजल प्रदूषण पर रोक लगेगी
- आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों को राहत मिलेगी
राजनीतिक बयानबाजी भी तेज
जहां सरकार इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की पिछली नीतियों की विफलता का उदाहरण बता रहा है।
कुलदीप वत्स का कहना है कि अगर समय रहते इको ग्रीन के काम की निगरानी की जाती, तो आज बांधवारी कचरे का पहाड़ न बनता। वहीं सरकार का तर्क है कि अब ठोस कदम उठाए गए हैं और परिणाम भी जल्द दिखेंगे।
2027 तक समस्या के समाधान की उम्मीद
सरकार ने साफ किया है कि 2027 तक बांधवारी लैंडफिल से जुड़े अधिकांश पुराने कचरे का निस्तारण कर लिया जाएगा। इसके साथ ही भविष्य में कचरा प्रबंधन के लिए अधिक सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जाएगा, ताकि किसी भी कंपनी की लापरवाही दोबारा न हो।
निष्कर्ष
बांधवारी लैंडफिल का मामला सिर्फ एक ठेके या कंपनी का नहीं, बल्कि हरियाणा के पर्यावरण और लाखों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इको ग्रीन का ठेका रद्द कर दो नई कंपनियों को जिम्मेदारी देना सरकार का एक बड़ा और जरूरी फैसला माना जा रहा है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि नई कंपनियां तय समयसीमा में काम पूरा कर पाती हैं या नहीं और क्या 2027 तक वाकई बांधवारी का कचरा पहाड़ इतिहास बन पाएगा।




