
हरियाणा में हैरान कर देने वाला मामला: ‘साहब! मैं जिंदा हूं, पेंशन दे दो’, अधिकारी बोले– आप तो मर चुके हो
कैथल | हरियाणा समाचार
हरियाणा के कैथल जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक बुजुर्ग नागरिक को पूरे एक साल तक सिर्फ इसलिए बुढ़ापा पेंशन नहीं मिली, क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि संबंधित व्यक्ति पूरी तरह जिंदा, स्वस्थ और अपने पैरों पर खड़ा है, लेकिन सरकारी कागजों में उसकी “मौत” दर्ज है।
यह कहानी है चीका कस्बे के वार्ड नंबर 3 निवासी जोगिंद्र सिंह की, जो पिछले कई महीनों से अपने ही जीवित होने के सबूत लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
आप तो मर चुके हो” – सुनकर उड़ गए होश
जोगिंद्र सिंह बताते हैं कि साल 2023 में अचानक उनकी बुढ़ापा पेंशन उनके बैंक खाते में आनी बंद हो गई। शुरुआत में उन्होंने सोचा कि तकनीकी कारणों से देरी हो रही होगी। लेकिन जब कई महीनों तक पेंशन नहीं आई, तो वे संबंधित विभाग के कार्यालय पहुंचे।
वहां उन्हें जो जवाब मिला, उसने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा—
“सरकारी रिकॉर्ड में आप मर चुके हो, इसलिए आपकी पेंशन बंद है।”
यह सुनकर जोगिंद्र सिंह के होश उड़ गए। उन्होंने अधिकारियों को समझाने की कोशिश की कि वह पूरी तरह से जिंदा हैं, रोजमर्रा का जीवन जी रहे हैं और खुद कार्यालय में खड़े हैं। इसके बावजूद रिकॉर्ड में दर्ज “मौत” के आगे उनकी बात बेअसर साबित हुई।
सरकारी रिकॉर्ड में कैसे हो गई ‘मौत’?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जोगिंद्र सिंह की मौत सरकारी रिकॉर्ड में कब और कैसे दर्ज हो गई। इस बारे में उन्हें आज तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाया है।
जोगिंद्र सिंह का कहना है कि उन्होंने कभी भी किसी प्रकार का मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं बनवाया, न ही परिवार की ओर से ऐसी कोई सूचना दी गई। इसके बावजूद समाज कल्याण विभाग के रिकॉर्ड में उनका नाम मृतकों की सूची में डाल दिया गया।
जिंदा साबित करने की जद्दोजहद
सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित होने के बाद जोगिंद्र सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को सरकारी तौर पर जिंदा साबित करने की बन गई। उन्होंने—
- आधार कार्ड
- वोटर आईडी
- बैंक पासबुक
- अन्य पहचान दस्तावेज
सब कुछ अधिकारियों के सामने पेश किया। इसके बावजूद पेंशन बहाल नहीं की गई।
जनवरी से दिसंबर 2024 तक बंद रही पेंशन
जोगिंद्र सिंह की बुढ़ापा पेंशन जनवरी 2024 से दिसंबर 2024 तक पूरी तरह बंद रही। पूरे एक साल तक उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक सहायता नहीं मिली।
बुजुर्ग होने के कारण उनकी आजीविका का मुख्य सहारा यही पेंशन थी। पेंशन बंद होने से उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों, दवाइयों और घर के खर्चों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
दफ्तर-दफ्तर भटकने को मजबूर बुजुर्ग
अपनी पेंशन बहाल कराने के लिए जोगिंद्र सिंह ने—
- समाज कल्याण विभाग हरियाण
- स्थानीय कार्यालय
- और यहां तक कि जिला प्रशासन
सभी को लिखित शिकायतें दीं। उन्होंने जिला उपायुक्त (DC) तक भी अपनी समस्या पहुंचाई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
जोगिंद्र सिंह का कहना है कि हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलता है, लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ती।
तकनीकी गलती या गंभीर लापरवाही?
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की पेंशन का नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि सरकारी रिकॉर्ड में एक छोटी सी गलती किसी नागरिक की जिंदगी को कितनी मुश्किल बना सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि—
- डेटा एंट्री में गलती
- गलत मृत्यु रिपोर्ट अपलोड होना
- या बिना सत्यापन के रिकॉर्ड अपडेट करना
ऐसी समस्याओं की बड़ी वजह हो सकती हैं।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला मामला नहीं है, जब किसी जिंदा व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित किया गया हो। देश के कई राज्यों से समय-समय पर ऐसी खबरें सामने आती रही हैं, जहां—
- पेंशन बंद हो जाती है
- राशन कार्ड निष्क्रिय हो जाता है
- या सरकारी योजनाओं का लाभ रुक जाता है
इन मामलों में आम नागरिक को खुद को जिंदा साबित करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
मानवीय पहलू: बुजुर्गों पर दोहरी मार
बुढ़ापा पेंशन बुजुर्गों के लिए सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का आधार होती है।
जोगिंद्र सिंह जैसे बुजुर्ग जब इस तरह की लापरवाही का शिकार होते हैं, तो—
- मानसिक तनाव बढ़ता है
- आर्थिक असुरक्षा पैदा होती है
- और सरकारी सिस्टम पर भरोसा कमजोर होता है
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इतने स्पष्ट मामले के बावजूद अगर महीनों तक कोई समाधान नहीं निकलता, तो यह प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है। सवाल यह भी उठता है कि—
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी?
- क्या जोगिंद्र सिंह को रुकी हुई पेंशन का बकाया मिलेगा?
- और क्या भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी?
डिजिटल इंडिया और जमीनी हकीकत
सरकार जहां एक ओर डिजिटल इंडिया की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे मामले यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि डिजिटल रिकॉर्ड की गलतियां आम आदमी के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती हैं।
जब सिस्टम में सुधार की बजाय नागरिक को ही दोषी ठहराया जाए, तो डिजिटल सुविधाएं अभिशाप बन जाती हैं।
निष्कर्ष
कैथल के जोगिंद्र सिंह का मामला न सिर्फ हैरान करने वाला है, बल्कि चेतावनी भी है। यह दिखाता है कि सरकारी रिकॉर्ड में एक गलत एंट्री किसी जिंदा इंसान को “कागजों में मरा हुआ” बना सकती है।
अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है और कब जोगिंद्र सिंह को उनका हक—
बुढ़ापा पेंशन और सम्मानजनक जीवन — वापस मिलता है।
यह मामला पूरे प्रदेश के लिए सबक है कि योजनाओं की सफलता सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार प्रशासन से तय होती है।




